विग्रहराज द्वितीय:- चौहान वंश के प्रारंभिक शासकों में सबसे प्रतापी राजा सिंहराज का पुत्र विग्रहराज द्वितीय हुआ, जो लगभग 956 ई. के आसपास सपाद्लाक्ष का शासक बना। इन्होने अन्हिल्पाटन के प्रसिद्ध चालुक्य शासक मूलराज-प्रथम को हराकर कर देने को विवश किया तथा भड़ौच में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया। विग्रहराज के काल का विस्तृत वर्णन 973 ई. के हर्षनाथ के अभिलेख से प्राप्त होता है ।
अजयराज:- चौहान वंश का दूसरा प्रतापी शासक अजयराज हुआ, जिसने (पृथ्वीराज विजय के अनुसार) 1113 ई. के लगभग अजयमेरु (अजमेर) बसाकर उसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। उन्होंने अन्हिल्पाटन के मूलराज-प्रथम को हराया। उन्होंने "श्री अजयदेव" नाम से चांदी के सिक्के चलाए। उनकी रानी सोमलेखा ने भी अपने नाम के सिक्के जारी किये।
इस वंश का सबसे प्रतापी राजा विग्रहराज चतुर्थ (1153-63 ई. ) था। इस वंश के अंतिम शासक पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में मोहम्मद गौरी को पराजित किया था, परन्तु 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में वह गौरी से पराजित हुआ तथा बंदी बना लिया गया और कुछ समय उपरान्त उसकी हत्या कर दी गई।
चौहान शासक अर्णोराज (1133-1153 ई.) ने तुर्क आक्रमणकारियों को हराकर अजमेर से आनासागर झील का निर्माण करवाया। उसके उत्तराधिकारी विग्रहराज चतुर्थ (1153-1163 ई.) (बीसलदेव) ने दिल्ली के तोमर शासक को हराकर दिल्ली को अपने राज्य में मिला लिया। विग्रहराज को "कवि बांधव" के नाम से नाम से जाना जाता है। विग्रहराज के दरबार में सोमदेव नामक कवि ने "ललित विग्रहराज" नामक नाटक लिखा। स्वयं विग्रहराज ने हरिकेली नाटक लिखा था। इन्होने अजमेर में संस्कृत पाठशाला बनवाई जिसे मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने "ढाई दिन के झोंपड़े" में परिवर्तित कर दिया। इनका काल "चौहान युग का स्वर्णयुग"कहलाता है। इन्होने टोंक के निकट बीसलपुर बाँध बनवाया ।
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